नैतिक मूल्यों की शिक्षा - Education in moral values
नैतिक मूल्यों की शिक्षा - आधुनिक वैज्ञानिक यन्त्रों (फेसबुक, इन्टरनेट, चलभाष इत्यादि) से बालकों को एक तरफ उन्नति करने का अवसर मिला है तो दूसरी तरफ उससे नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। बालक के जीवन का सबसे अहम् स्थान स्कूल है। वहाँ का वातावरण सीधा उनके मन पर प्रभाव डालता है। उन्हीं स्कूलों में इन्टरनेट को अनिवार्य घोषित किया जा चुका है। इन्टरनेट पर पढाई के अलावा भी तो नाना प्रकार के अनुचित मार्ग पर ले जाने वाले आकर्षण हैं। इन सबकी वजह से बालकों का जीवन तो अनैतिकता के गर्त में जा गिरा है। ऐसी परिस्थिति में माता-पिता, आचार्य का उत्तरदायित्व होता है कि बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा दें। अच्छे संस्कार देते हुए उनको सदाचार से युक्त, सुयोग्य एवं लायक बनावें। माता निर्माताः भवति माता बच्चे की प्रथम गुरु है। माता को उन्हें कुकर्मों से बचाना होगा, किसी भी अंग से कुचेष्टा न करने पावे ऐसा प्रयास करना होगा। उन्हें सत्यभाषण की आदत डालें, मादक-द्रव्यों से दूर रखें। ऋग्वेद, मण्डल-7, सूक्त-2, मन्त्र-11 का भावार्थः - हे विद्वान! जैसे सूर्य का प्रकाश दिव्य गुणों के साथ नीचे भी स्थित हम सबों को प्राप्त होता है और सत्य विद्या से युक्त उत्तम संतान वाली माता सुखपूर्वक स्थित होती है, वैसे ही विद्वान हम सबों को, विशेषकर बालकों को, आप प्राप्त होकर अच्छी शिक्षा से सुखी कीजिये।

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